भारतीय नारी 2.0

सुनो भारत देश की
नयी निराली ये दास्ताँ हैं

अपनी शीला नाजुक है नादान हैं
क्योंकि, वो अभी अभी हुई जवान है

मुन्नी की तो बात न पूछो
वो गली गली बदनाम है |

कल तक जो रज़िया राज करती थी
वो अब गुंडों से परेशान हैं

धन्नो बेचारी, उसके होने वाले हाल
को सोच कर परेशान है |

वक़्त की नयी बयार है ये
नयी दौर का नया इम्तेहान है
कल तक जिनसे घर की शोभा थी
वो अब बस आइटम हैं, सामान हैं |

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Ek Din nadi ke teere [ Bhojpuri Nirgun Song with Lyrics and Meaning ]

I had heard this song during my grandfather’s funeral ceremony and got totally awestruck by the song. With what ease it portrays the truth of everything around us. Do listen to it once you get time.

Though it would best be appreciated by someone from Bihar/Jharkhand/UP region, I have written the lyrics and meaning for everyone else’s help.

एक दिन नदी के तीरे जात रहनी धीरे धीरे -3
हम आंखिन देखनी सुंदर शारीरिया आगिया मे जरेला ये राम -2
[One Day, While I was walking leisurely at the river's bank,
I saw, what a beautiful body being burned on pyre]

बंसवा के लेई विमाना, घाटे आइले चारी जाना -2
मुंहवा पे अगिया, अपने जमलका उंहवा धरेला ये राम
[on a bed made of bamboos, four people brought him
and then his own son put the fire on his face !]
हम आंखिन देखनी सुंदर शारीरिया आगिया मे जरेला ये राम -2
[..yeah I saw, what a beautiful body being burned on pyre]

हीत मीत जे जे रहला, एके मुंहे सभे कहला -2
बेटा के जारले बाबूजी के नश्वर तनवा तरले ये राम
[All the friends and relatives whoever were there, All of them said the same words
That, the man's mortal body gets peace only when burned by his son.]
हम आंखिन देखनी सुंदर शारीरिया आगिया मे जरेला ये राम -2
[..yeah I saw, what a beautiful body being burned on pyre]

भला बुरा कर्म कमाई, जेहि लागी कइलो ये भाई -2
तब काहे खातीर, तब काहे खातीर !! उंच नीच मानुष देहिया करेला यह राम !
[Good, Bad, Making money, whatever you did, everyone has this same ending
Why do people still try to prove themselves superior to others]
हम आंखिन देखनी सुंदर शारीरिया आगिया मे जरेला ये राम -2
[..yeah I saw, what a beautiful body being burned on pyre]

कूल्हि भइल जेकरा लागी उहे धईल मुंह पर आगी,
ई सोच के बागी ई सोच के बागी, अंखियाँ से झर झर लोरवा झरेला ये राम !
[For whom I become a coolie, toiled so hard in my life. The same son is torching my body today.
Whenever, I think about it..My eyes gets filled with tear..]
हम आंखिन देखनी सुंदर शारीरिया आगिया मे जरेला ये राम -2
[..yeah I saw, what a beautiful body being burned on pyre]

एक दिन नदी के तीरे जात रहनी धीरे धीरे -3
हम आंखिन देखनी सुंदर शारीरिया आगिया मे जरेला ये राम -2

[One Day, While I was walking leisurely at the river's bank,
I saw, what a beautiful body being burned on pyre]

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Song O Ri Chiraiya from Satyamev Jayate

ओ री चिरईया नन्ही सी चिड़िया अंगना मे फिर आ जा रे …
ओ री चिरईया नन्ही सी चिड़िया अंगना मे फिर आ जा रे …
अँधियारा है घना और लहू से सना
किरणों के तिनके अंबर से चुनके
अंगना मे फिर आ जा रे

हमने तुझपे हजारों सितम हैं किए
हमने तुझपे जहां भर के जुल्म किए
हमने सोचा नहीं, तू जो उड़ जाएगी
ये ज़मीन तेरे बिन सूनी रह जाएगी
किसके दम पे सजेगा मेरा अंगना

ओ री चिरईया मेरी चिरईया अंगना मे फिर आ जा रे …

तेरे पंखों मे सारे सितारे जड़ूँ
तेरे चूनर धनक सतरंगी बुनूँ
तेरे काजल मे मैं काली रैना भरून
तेरी मेहंदी मे मैं कच्ची धूप मलूँ
तेरे नैनों सजा दूँ नया सपना

ओ री चिरईया मेरी चिरईया अंगना मे फिर आ जा रे !
ओ री चिरईया नन्ही सी चिड़िया अंगना मे फिर आ जा रे
ओ री चिरईया ।

 

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Is small really beautiful

Had a chance to attend a group discussion session yesterday. Probably the first, I have ever been part of. The subject of the discussion was: Is Small Really Beautiful.

While I was thinking that for such a simple topic people would talk about perception, definition of beauty, the very subjectivity of this definition and how irrelevant anything else is;  be it size, shape, color, odor and anything else for that matter.

But I was in for a shock. The wannabe business students of India, were so keen to insert jargon that the whole discussion became futile and at the end of the day it was like a fish market, where every candidate was selling a new buzz word.

Don’t remember most of the answers but here are some. Judge the value of these answers yourself.

  • Small has to be beautiful. See Bharti it started small and how beautiful company it is.
  • All small things are beautiful. The computer chips, the electrons all these things are small and beautiful.
  • Small can never be beautiful. You see small people, from small places, smaller institutions always perform small and earn small. You need to think big to make big. A beautiful mind thinks big. So big is beautiful. Have you seen A beautiful mind, John Nash? And there was this other movie Life is beautiful …
  • Beauty starts small. The big bang was small and see how beautiful universe it has made. The cells, the protozoa, the mitochondria  all important things are small. Small is always beautiful.
  • Switzerland is small and beautiful, (some another country name) is also small and beautiful. See big countries, India. Not at all beautiful. Big population, big problem.
  • Big is difficult to  manage. Big companies don’t perform well, their share price goes down in the longer turn. One should not invest in big companies.

Sadly most of them forgot the beauty of simplicity in the course of discussion.

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डाकिये की तलाश

Dakiya

Image taken from Dainik Bhaskar

डाकिया डाक लाया, डाकिया डाक लाया
ख़ुशी का पयाम कहीं, कहीं दर्दनाक लाया
डाकिया डाक लाया
अब आप सोचेंगे की सरल मोबाइल सन्देश के इस ज़माने में यह कौन कम अकल आ गया है जो  डाकिये की तलाश कर रहा है. अजी  क्या बताएं अब, बड़ा ही बदनसीब  बेचारा है, अभी थोड़ी देर पहले टीवी पर ऊपर लिखे गाने को सुन कर सोच में पड़ गया की आखिरी बार कब किसी डाकिये ने मेरे लिए कोई सन्देश लाया था.
जहाँ तक याद पड़ता है, २००४ में मैंने पहला मोबाइल फ़ोन ख़रीदा था, उसके बाद तो न खुद किसी को चिट्ठी लिखी और ना ही कभी किसी की चिट्ठी  आई. अब हम तो लैंड लाइन जमाने में पैदा हो कर मोबाइल युग में बड़े हुए. जहां आज कल के पिया खतों खतूत करने की जगह ज्यादातर रंगून जाकर अपनी प्रेमिका को टेलीफून करते हैं. चिट्ठियां तो वेब १.० वाली बात हो गयी या फिर  गुमशुदागंज वाले मामाजी की भाषा में कहें तो.. “चिट्ठियां तो पिताजी लिखा कर थे”.
सचमुच चिट्ठियां तो पिताजी लिखा करते थे और एक शिक्षक होने के नाते हमें सिखाते भी थे, की ऐसे लिखो, वैसे लिखो, यह मत लिखो, वो मत लिखे. हमने सिखा तो जरूर पर  यह ज्ञान बहुत कम ही इस्तेमाल किया.  बचपन के पत्र ज्यादातर परीक्षावों तक ही सीमित रहे.
बचपन में किताबों कहानियों में पत्र-मित्र के बारे में काफी पढ़ा सुना था, सोचा था आगे जाकर हम भी कभी पत्र मित्रता करेंगे. पर जब पत्र मित्र बनाने का मौका मिला तब तक पत्र-मित्र chat-friends में बादल चुके थे. यह एक मौका भी हाथ से गया.
वैसे २-४ पत्र तो हमने लिखे ही थे, स्कूल से निकले फिर कॉलेज गए तो अपने एक पुराने साथी से पत्राचार के जरिये संपर्क बनाये रखा, मगर बकरे की अम्मा कब तक खैर मानती, इन पत्रों पर भी एक दिन मोबाइल की गाज गिर ही गयी. अभी भी रखें हैं वोह पत्र, अलमारी के किसी कोने में शो पीस  बन कर.
अब सामान्य पत्रों से परे जाकर प्रेम पत्रों की बात करें | बहुत मन था की कभी किसी से प्रेम हो और उसको पत्र लिखूं. एक ख़ूबसूरत से फूलदार रंगीन कागज़ पर एक रूमानी सी दास्ताँ लिखूं, कुछ चोरी के शेर लिखूं, कुछ फिल्मों के गीत लिखूं. कभी उसको मेहरबान लिखूं , कद्रदान लिखूं, हसीना लिखूं, दिलरुबा भी लिखूं (तो क्या हुआ अगर  अगर आखीरी  पंक्तियाँ ‘संगम’ फिल्म के एक गाने से चुरायी गयीं हैं ), और फिर उसमे खुशबू डाल कर पोस्ट करून. अब ना प्रेम हुआ ना प्रेम पाती  का मौका आया. जब प्रेम की पींगे लड़ाने की सोच रहे थे तो मम्मी पापा ने शादी करा दी.
मरता क्या ना करता, सोचा की चलो अपनी जीवन संगिनी को ही एक प्रेम पत्र लिख मारूं. खूब जोर शोर से, दम ख़म लगा कर लिखा भी. मगर…  मगर भेजना भूल गया, और विडम्बना यह की शादी के पहले लिखा ख़त उनको शादी की पहली साल गिरह को पढ़ कर सुनाया.
अब यह था मेरा पहला प्रेम पत्र, और आखिरी ख़त, जो अपनी अंजाम तक पहुँच ना सका. और अब यह आलम है की आजू बाजू ना कलम दिखाई देते  है और ना ही कोई कागज़ के टुकड़े. नोटबुक की जगह notepad  आ चूका है और दिल को दिलासा देने के लिए कभी कभार इ-पत्र (अरे email भाई साहब ) ही लिख लिया करते हैं.
डाकिया  बाबु भी अपना रूप बदल चुके हैं. आते तो हैं हर महीने मगर, किसी का पैगाम नहीं लेकर बल्कि क्रेडिट कार्ड का बिल लेकर.
मगर फिर भी दिल में एक उम्मीद रहती है, की कभी ना कभी, कोई ना कोई, गलती से ही सही,  एक पत्र तो डालेगा ही. अगर आपका मन कर रहा हो तो पता लिखे दे रहा हूँ.
अन्थोनी गोंजाल्वेस
रूप महल, प्रेम गली
खोली नंबर   ४२०
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शान से चलो !!

Picture Source:
guardianangel.in

क्यों फिक्र गिरने की जब
बादलों को छूने का हौसला है तुम में ,
बस  निडर बनो और बढ़ चलो

नहीं होते परवाज़ सभी के पास,
लग जायेंगे पंख पैरों में ,
उड़ने की चाह  लेकर  बस उड़  चलो |

मंजिल की फिक्र किस बात की
जब रास्ते पर है तुम्हे यकीं
हर मोड़ पर मिलेगी एक नयी मंजिल
यह अभी से मान के चलो |

साथी साथ हो तो अच्छा है
साथ ना मिले तो एकला चलो |
चले हो तुम तो फिर  ठोकर का डर क्यूँ !
चल दिया है तो फिर शान से चलो !!

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It Begins…

It was drizzling.

It was getting dark.

It was alone. It was hungry.

It smelt food. It was across the street.

It waited.

It turned red.

It was empty for a while.

It was courageous. It moved ahead.

It was happy of its feat.

It was half done only.

It tried to move again.

It turned green.

It zoomed past.

It was lucky. It was frightened. It stopped in the middle. It was waiting for a chance.

It was seen by someone. It was shooed back.

It ran for its life. It went hiding in the bushes.

 

It ends.

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